अमेरिकी साम्राज्यवाद और WTO के सामने मोदी सरकार का आत्मसमर्पण कृषि संकट को और गहरा कर रहा है - किसान महासभा

अखिल भारतीय किसान महासभा के बिहार राज्य सचिव सह राष्ट्रीय सचिव उमेश सिंह ने 2026-27 के करीब फसलों के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि यह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के किसान-विरोधी चरित्र को उजागर करता है।

अमेरिकी साम्राज्यवाद और WTO के सामने मोदी सरकार का आत्मसमर्पण कृषि संकट को और गहरा कर रहा है - किसान महासभा
Image Slider
Image Slider
Image Slider

पटना  21 मई 2026

 अखिल भारतीय किसान महासभा के बिहार राज्य सचिव सह राष्ट्रीय सचिव उमेश सिंह ने 2026-27 के करीब  फसलों के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि यह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के किसान-विरोधी चरित्र को उजागर करता है।

भाजपा ने 2014 के चुनावी घोषणा पत्र में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार व्यापक उत्पादन लागत (सी2) पर कम से कम 50 प्रतिशत लाभ जोड़कर सी2+50% की दर से एमएसपी देने का वादा किया था, लेकिन मोदी मंत्रिमंडल ने एमएसपी की घोषणा A2+FL लागत के आधार पर की है, जो व्यापक उत्पादन लागत से लगभग 30 प्रतिशत कम है।

धान, जो सबसे महत्वपूर्ण खरीफ फसल है, का एमएसपी ₹2,441 प्रति क्विंटल तय किया गया है, जबकि सी2+50% के अनुसार यह ₹3,243 प्रति क्विंटल होना चाहिए था।

इसका अर्थ है कि किसानों को प्रति क्विंटल ₹802 का नुकसान होगा। पूरे देश के किसानों को केवल 20 फसलों पर लगभग ₹3 लाख करोड़ का नुकसान झेलना पड़ेगा।

चूंकि खरीद की समुचित व्यवस्था नहीं है, बड़े व्यापारी और बिचौलिए किसानों का और अधिक शोषण करेंगे, जिससे वास्तविक नुकसान कई गुना बढ़ जाएगा।

उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने अमेरिकी साम्राज्यवाद और WTO के सामने आत्मसमर्पण करते हुए यह तर्क स्वीकार कर लिया है कि सब्सिडी “बाजार विकृति” पैदा करती है, जिससे भारत में कृषि संकट और गहरा हुआ है।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) ने राज्यों द्वारा दिए जाने वाले बोनस को भी “मार्केट डिस्टॉर्शन” बताया है, जो अमेरिकी साम्राज्यवाद की भाषा बोलने के समान है।

यह भारत की खाद्य संप्रभुता को भीतर से कमजोर करने का प्रयास है। CACP स्वयं स्वीकार करता है कि C2 ही वास्तविक लागत है, लेकिन इसके बावजूद वह कम A2+FL लागत को आधार बना रहा है, जो स्वामीनाथन आयोग की सी2+50% सिफारिश का खुला उल्लंघन है।

उन्होंने कहा कि जबकि आधिकारिक थोक मूल्य सूचकांक (WPI) को 2023 में 2017-18 के आधार वर्ष पर स्थानांतरित किया गया, CACP आज भी 15 वर्ष पुराने आंकड़ों पर आधारित अनुमान लगा रहा है।

किसान आज की लागत चुका रहे हैं लेकिन उन्हें 2011-12 की दरों के हिसाब से मूल्य दिया जा रहा है। यह CACP द्वारा किया जा रहा आपराधिक हेरफेर है।

उन्होंने कहा कि CACP के आंकड़े सरकार के इस दावे की पोल खोलते हैं कि किसानों को लाभकारी मूल्य मिल रहा है।

ये अनुमान भी केवल सरकारी प्रक्षेपित लागतों पर आधारित हैं, जबकि वास्तविक उत्पादन लागत बीज, उर्वरक, कीटनाशक, डीजल, बिजली, सिंचाई, मशीनरी और मजदूरी की लगातार बढ़ती कीमतों के कारण कहीं अधिक है।

पिछले वर्षों का अनुभव दिखाता है कि घोषित MSP भी अधिकांशतः कागजों तक सीमित रहता है क्योंकि खरीद व्यवस्था कमजोर और सीमित है तथा बड़ी संख्या में किसान MSP से कम कीमत पर फसल बेचने को मजबूर होते हैं।

पिछले एक वर्ष में सभी कृषि आदानों की कीमतें आसमान छू रही हैं। सरकार अब पश्चिम एशिया संकट का बहाना बनाकर जनता पर और अधिक बोझ डालने के लिए “मितव्ययिता” का आह्वान कर रही है।

उर्वरकों की कमी पहले ही शुरू हो चुकी है और जमाखोर काला बाजारी के माध्यम से भारी मुनाफा कमा रहे हैं। NCRB के ताजा आंकड़े बताते हैं कि गंभीर कृषि संकट के कारण किसानों की आत्महत्याएं लगातार जारी हैं।

इस संकट से निकलने का एक रास्ता यह है कि MSP को व्यापक उत्पादन लागत का डेढ़ गुना घोषित किया जाए और साथ ही भूमिहीनों, गरीब किसानों, मध्यम किसानों तथा बटाईदार किसानों के लिए पूर्ण कर्जमाफी लागू की जाए।

उन्होंने कहा कि सरकार यह दावा कर रही है कि 2026-27 की खरीफ फसलों के लिए MSP भुगतान लगभग ₹2.6 लाख करोड़ होगा।

लेकिन अनुमान के अनुसार 2014 से 2024 के बीच केवल 20 फसलों पर सी2+50% की दर से एमएसपी से इनकार के कारण किसानों को कुल मिलाकर ₹27 लाख करोड़ का नुकसान हुआ है।

जबकि किसान गहरे कर्ज में डूबे हैं, जबकि मोदी सरकार हर वर्ष औसतन ₹2 लाख करोड़ के कॉरपोरेट कर्ज माफ कर रही है।

उन्होंने कहा कि 2014 की तुलना में NCRB की नवीनतम 2024 रिपोर्ट के अनुसार किसानों और खेत-मजदूरों की आत्महत्याओं का दैनिक औसत 77 से बढ़कर 173 हो गया है। यह पिछले एक दशक में आत्महत्याओं में भयावह वृद्धि को दर्शाता है।

प्रधानमंत्री और कॉरपोरेट मीडिया इस आधिकारिक आंकड़े पर आपराधिक चुप्पी बनाए हुए हैं, जो देश में गहराते कृषि संकट की गंभीरता को उजागर करता है।

2026-27 के लिए धान का सी2+50% मूल्य किसी भी सरकारी मंच या संस्था द्वारा औपचारिक रूप से घोषित नहीं किया गया है, जो इस तथ्य को दबाने और जनता को गुमराह करने की साजिश को दर्शाता है।

C2+50% की दर से एमएसपी की लड़ाई भारत की संप्रभुता की रक्षा की लड़ाई है। CACP का फर्जी लागत फार्मूला MSP को कृत्रिम रूप से कम बनाए रखता है। WTO, अमेरिकी दबाव में, भारत की MSP व्यवस्था पर प्रतिबंध लगाता है।

मोदी सरकार एक ओर अमेरिकी सब्सिडी वाली कृषि उपज के लिए बाजार खोल रही है और दूसरी ओर राज्यों को किसानों को राहत देने से रोक रही है। यह अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने समर्पण है।

अखिल भारतीय किसान महासभा ने अपने सभी घटक संगठनों और पूरे किसान समुदाय से आह्वान करता है कि वे मोदी सरकार के पिछले 12 वर्षों के किसान-विरोधी और मेहनतकश-विरोधी विश्वासघात को उजागर करें।

यह शासन अमेरिकी साम्राज्यवाद और WTO की नीतियों के सामने झुक चुका है। अखिल भारतीय किसान महासभा ने 27 से 31 मई 2026 के बीच गांवों में एमएसपी आदेश की प्रतियां जलाकर विरोध प्रदर्शन आयोजित करने का आह्वान किया है।